
जन लोकपाल विधेयक से पहले कानून में संशोधन की भी आवश्यकता है....!
कानून व संविधान में संशोधन किये बिना क्या जन लोकपाल विधेयक कामयाब हो पायेगा....?
इन दिनों चारों ओर एक ही चर्चा है कि आखिरकार जनलोकपाल विधेयक के बन जाने से क्या भ्रष्टाचार पर अंकुश लग पायेगा या फिर नहीं। लेकिन इन सब के बीच मेरा यह व्यक्तिगत विचार है कि जन लोकपाल विधयेक बनाने से पहले हमें अपने नियम व कानून में भी कुछ संशोधन करने अति आवश्यक हैं, क्योंकि हम हमेशा से देखते आये हैं कि जुर्म साबित होने के बावजूद सजा मिलने में इतना देर हो जाता है कि तब तक या तो आरोपी किसी उच्चे दर्जें का अधिकारी कर्मचारी व मंत्री तक बन जाता है या फिर तब तक इस परिस्थिति में पहुंच जाता है कि उसे सजा ही नहीं दी जा सकती। लेकिन वहीं दूसरी ओर यह भी 100 प्रतिशत सच है कि यह सब सिर्फ उच्च वर्गों के साथ होता है ना की निम्न वर्ग के लोगों के साथ। अतः कुल मिलाकर देखा जाये तो जन लोकपाल विधेयक के बनने के बाद जब भी भ्रष्टाचार की जांच होगी तो 95 प्रतिशत लोग उच्च वर्ग के ही फसंगे न कि निम्न वर्ग के, इसलिये लोकपाल विधयेक के बनाने के पूर्व सिविल सोसायटी व सरकार को कानून में संशोधन करने की भी आवश्यकता है। भले ही यह हो सकता है कि कम उम्र व सोच का तकाजा हो और बहुत कुछ गलत भी मैंने लिखा हो, लेकिन यकिन कीजिये यह केवल और केवल मेरे सोच का नतीजा है, हो सकता है कि सारे सुझाव गलत हो, लेकिन यदि यर्थाथ के धरातल पर जो लोग कार्य करते हैं, उन्हें इस लेख से जरूर कुछ न कुछ तथ्य और बिन्दू मिलेंगे जो कि विचारणीय होगें,
- अंचल ओझा, प्रधान संपादक, हिन्दी मासिक युवा मत
अम्बिकापुर/पिछले कई महिने से गांधीवादी समाज सेवी अन्ना हजारे जन लोकपाल विधेयक बनाने एवं इसके परिपालन को लेकर कई तरह की तैयारी में लगे हुए हैं, इस दौरान उन्होंने दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन भी किया साथ ही विपक्षी पार्टीयों व सरकार के वरिष्ठ लोगों से मुलाकात कर इस जन लोकपाल विधेयक को बनाने हेतु और इस पर अमल करने के प्रस्ताव को लेकर कई तरह की चर्चा देश भर में चल रही है।
फिलहाल देश भर से अन्ना को भरपुर समर्थन भी हासिल हो रहा है, लेकिन इस बिच सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि जो लोग जन लोकपाल बिल हेतु अन्ना का समर्थन कर रहे हैं, उनमें 80 से 90 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जो कि इस बारे में कुछ जानते व समझते ही नहीं है, वे केवल जोश में आकर होश खो बैठे हैं और समर्थन कर रहे हैं, लेकिन क्या केवल समर्थन भर से जन लोकपाल विधयेक जैसा सिविल सोसायटी चाहती है वैसा बन पायेगा। जबकि वास्तविकता तो यह है कि जन लोकपाल विधेयक का समर्थन करने वाले आधे से अधिक लोग या तो नेट के कई माध्यमों फेसबुक, ऑरकुट, ट्विट्र व कई माध्यमों से जुड़कर इस समर्थन कर रहे हैं और उन्हें ना तो सही मायने में लोकतंत्र का अर्थ पता है और ना ही देश का कानून तो क्या ऐसे समय में यह नहीं कहा जा सकता कि जन लोकपाल विधयेक को बनाने में जल्दबाजी की जा रही है।
जन लोकपाल विधेयक का बनना देशहित में जरूरी है, लेकिन इसमें अभी भी सिविल सोसायटी व सरकार के बिच मतभेद बरकरार है। सबसे बड़ी बात यह है कि यदि इसके दायरे में प्रधानमंत्री को लाया जाता है तो ऐसे में पद की गरिमा प्रभावित होगी, क्योंकि लोकायुक्त या तो कोई वरिष्ठ आईपीएस, आईएस, रिटायर्ड आईपीएस, रिटायर्ड आईएस, न्यायाधिश या फिर किसी अन्य अधिकारी को बनाया जा सकता है, लेकिन क्या इन सभी के पास प्रधानमंत्री की हाजरी व न्यायाधिश की हाजरी पद की गरिमा के साथ खिलवाड़ नहीं है, जबकि संविधान व न्याय व्यवस्था में पद की गरिमा को लेकर कई तरह के प्रोटोकॉल नियम भी तय हैं, ऐसे में प्रधानमंत्री को लोकपाल से बाहर रखना ही उचित लगता है, वहीं दूसरी ओर प्रधानमंत्री को यदि भ्रष्टाचार के मामले में किसी के दायरे में लाना है तो प्रधानमंत्री को सर्वोच्च न्यायालय के दायरे में लाना उचित होगा ना कि लोकायुक्त सहित कई ऐसे मामले हैं जिसे लेकर जन लोकपाल पर अंगुली उठाई जा सकती है।
दूसरी बात यह की क्या सिविल सोसायटी में जिन लोगों को शामिल किया जाना है उसमें क्या अन्ना हजारे के द्वारा तय किये गये लोग ही जाने चाहिये, यह उचित है कि गांधीवादी समाज सेवी अन्ना हजारे को इस सिविल सोसायटी के उन लोगों में शामिल करना चाहिये जो कि जन लोकपाल मसौदे के साथ ही इसकी कार्यवाही में शामिल होंगे, इसके अलावा जिन व्यक्तियों को शामिल करना है, उसके लिये जनता का फैसला व उनका चयन जनता के द्वारा हो तभी सही मायने में जन लोकपाल विधयेक को बनाने का अर्थ सही होगा। क्योंकि सिविल सोसायटी मतलब सिर्फ गिने चुने अन्ना के साथ रहने वाले लोग ही नहीं है, बल्कि देश की पुरी जनता है अर्थात् इस मामले में सभी की राय व मशवरा लेना बेहद जरूरी है।
दूसरी ओर जन लोकपाल विधयेक के मसौदे में जो लोकपाल विधेयक का प्रारूप सिविल सोसायटी ने बनाया है, उसमें भ्रष्टाचारी पर कार्यवाही के साथ ही एक माह के अंदर सजा का प्रावधान है, लेकिन भारतीय लोकतंत्र व संविधान के अनुसार सजा देने का कार्य केवल न्यायपालिका को मिला हुआ है और जुर्म साबित होने पर सजा भी न्यायपालिका के द्वारा ही मिलेगा, लेकिन क्या जिस तरह के कानून व नियम हमारे देश में हैं, उससे क्या यह कहा जा सकता है कि सजा एक माह में मिल जायेगा।
इस हेतु मेरा व्यक्तिगत विचार जो है वह यह है कि जन लोकपाल विधयेक बनाने से पहले हमें अपने नियम व कानून में भी कुछ संशोधन करने अति आवश्यक हैं, क्योंकि हम हमेशा से देखते आये हैं कि जुर्म साबित होने के बावजूद सजा मिलने में इतना देर हो जाता है कि तब तक या तो आरोपी किसी उच्चे दर्जें का अधिकारी कर्मचारी व मंत्री तक बन जाता है या फिर तब तक इस परिस्थिति में पहुंच जाता है कि उसे सजा ही नहीं दी जा सकती। लेकिन वहीं दूसरी ओर यह भी 100 प्रतिशत सच है कि यह सब सिर्फ उच्च वर्गों के साथ होता है ना की निम्न वर्ग के लोगों के साथ। अतः कुल मिलाकर देखा जाये तो जन लोकपाल विधेयक के बनने के बाद जब भी भ्रष्टाचार की जांच होगी तो 95 प्रतिशत लोग उच्च वर्ग के ही फसंगे न कि निम्न वर्ग के, इसलिये लोकपाल विधयेक के बनाने के पूर्व सिविल सोसायटी व सरकार को कानून में संशोधन करने की भी आवश्यकता है।
वहीं दूसरी ओर जन लोकपाल विधयेक बनाने से पहले सरकार व सिविल सोसायटी के प्रतिनिधियों व गांधीवादी समाज सेवी अन्ना हजारे साहब को आम जनता में जागरूकता उत्पन्न करने के साथ ही उनकी भी आम राय लेनी चाहिए की आखिरकार इस विधेयक को लेकर उनकी क्या राय है और शायद कहीं से इस विधेयक के लिये कोई नया बिन्दू मिल जाये। अतः सर्वप्रथम आम लोगों में इस विधेयक को लेकर जन जागरण करने की आवश्यकता भी है, तभी जन लोकपाल विधेयक बनने के बाद सार्थक हो सकता है।
वहीं जन लोकपाल विधेयक में एक बिन्दू यह भी जोड़ा जाना चाहिए की शिकायतकर्ता की शिकायत जांच के बाद गलत निकलती है तो उसे भी सजा होना चाहिये भले ही उससे कुछ राशि सजा के तौर पर राष्ट्रिय कोष में जमा कराया जाये, नहीं तो सूचना के अधिकार 2005 कानून की तरह ही यह विधेयक भी अधिकारियों, कर्मचारियों को परेशान करने वाला साबित होगा और फिर कुछ लोग इसे लेकर जबरन में अधिकारियों पर भ्रष्टाचार का आरोप मढ़ कर शिकायत करंेगंे और फिर जांच में समय जायेगा और तब तक शासकीय कार्यों में भी बाधा उत्पन्न होगा, जिससे की जनहित के कार्य रूकेंगे। इस विषय पर भी जन लोकपाल विधेयक को लेकर सिविल सोसायटी का प्रतिनिधित्व कर रहे गांधीवादी समाज सेवी अन्ना जी को सोचना चाहिए।
भले ही यह हो सकता है कि कम उम्र व सोच का तकाजा हो और बहुत कुछ गलत भी मैंने लिखा हो, लेकिन यकिन कीजिये यह केवल और केवल मेरे सोच का नतीजा है, हो सकता है कि सारे सुझाव गलत हो, लेकिन यदि यर्थाथ के धरातल पर जो लोग कार्य करते हैं, उन्हें इस लेख से जरूर कुछ न कुछ तथ्य और बिन्दू मिलेंगे जो कि विचारणीय होगें, आप सभी के मार्गदर्शन व सुझाव की प्रतिक्षा में आपका ...................!
गांधीवादी समाज सेवी अन्ना हजारे जी जन लोकपाल विधेयक बनवाने में सफल हो, यह मेरी शुभकामना है और इसी शुभकामना के साथ अपने कलम को विराम देता हूं।
जय हिन्द - जय भारत - जय छत्तीसगढ़
अंचल ओझा, प्रधान संपादक, हिन्दी मासिक युवा मत
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